रामराज में भ्रष्टाचार का क्या काम?

 


देश की सर्वोच्च अदालत में जब राम मंदिर निर्माण का मुद्दा अपने अंतिम चरण में है तब लोगों की रामराज की कल्पना भी बलवती हो जाती है। इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने वाली पार्टियों का भी यही तर्क है कि राम मंदिर बन जाने से देश में रामराज आयेगा और एक अच्छे समाज का निर्माण होगा। यह तर्क जितनी सहजता से दिया जा रहा है उतना ही मुश्किल है समाज का पुननिर्माण। इसकी बड़ी वजह है कि आज के भारतीय समाज में भ्रष्टाचार ने जिस हद तक अपने पैर पसार दिये हैं उस पर विराम लगाने में किसी की दिलचस्पी नहीं दिखाई दे रही है। पिछले कई दशकों से जब-जब सरकार के घोटालों से पर्दा उठा है तब-तब ही विपक्षी पार्टियों ने चुनावों में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है और उन्हें इसका फायदा भी मिला है लेकिन विडंबना है कि चुनाव जीतने के बाद यह मुद्दा एकदम हवा हो गया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार ऐसा मुद्दा है जिसे खत्म करना सरकार के भी बस की बात नहीं है। ऐसा नहीं है, यदि सरकार में बैठे लोग पूरी इच्छाशक्ति से भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लड़ें तो यह काम मुश्किल भी नहीं है।


2014 के आम चुनाव की याद करें तो बीजेपी ने उस चुनाव में भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया था। सरकार बनने के कुछ महीनों तक तो इस मामले में जोरशोर से काम हुआ लेकिन फिर सरकार की ही प्राथमिकता से यह गायब हो गया। ऐसा ही कुछ 2015 में दिल्ली में भी हुआ। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने चुनावों के दौरान भ्रष्टाचार को बड़ी मजबूती से उठाया था लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि प्रारंभिक प्रयासों के बाद यह मुद्दा उनके अजेंडे से भी गायब हो गया। शायद दोनों ही नेताओं की दिलचस्पी भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लड़ने में नहीं रही। केन्द्र सरकार ने अपने पूर्व के कार्यकाल के अंतिम चरण में लोकपाल की नियुक्ति जरूर की लेकिन अफसरशाही में फैले भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग सकी। आज स्थिति यह है कि सरकार का हर महकमा भ्रष्टाचार से अलग नहीं है और जैसे लोगों ने भी इसे अंगीकार कर लिया है। जबकि सच्चाई यह है कि भ्रष्टाचार ही वह सामाजिक बुराई है जो विकास की राह में रोड़े अटका रही है। विकास की दुहाई तो दी जा रही है, लेकिन विकास को लीलने में कौन सी बाधा आड़े आ रही है, उस पर ध्यान सरकार नहीं दे रही है। यदि भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाये तो विकास की गति स्वत: ही तेज हो जायेगी।


दरअसल भ्रष्टाचार को यदि परिभाषित किया जाये तो यह अफसरशाही तक ही सीमित नहीं है। कहीं न कहीं समाज भी इसके लिए जिम्मेदार है। जैसे-जैसे समाज में पूंजीवाद ने जन्म लिया है तैसे-तैसे चारित्रिक पतन भी हुआ है। आज स्थिति यह है कि धनअर्जन के लिए लोगों ने सभी जीवन मूल्यों को भी तिलांजलि दे दी है और यह भी भ्रष्टाचार के दायरे में ही है। वर्तमान समय में धन इकट्ठा करने की लालसा ने समाज में एक विकृति खड़ी कर दी है। इस अंधी दौड़ से ही चारित्रिक पतन तेजी से हो रहा है जो अपराधों को भी जन्म दे रहा है। संस्कारों में आई भारी गिरावट का परिणाम है कि अपराध बढ़ रहे हैं जिन्हें रोकने में कानून भी सहायक सिद्ध नहीं हो रहा है। इसके लिए हालांकि समय-समय पर सरकार द्वारा कानूनों में भी संशोधन किया जाता है लेकिन किसी का ध्यान उसके कारणों की तरफ नहीं जाता। हमें अपराधों की मूल वजह को तलाशना होगा ताकि स्वच्छ समाज का निर्माण करने में आसानी हो सके।


पिछले कुछ सालों से जिस प्रकार सोशल मीडिया का चलन बढ़ा है वह भी सामाजिक और चारित्रिक पतन का कारण बना है। इसके साथ ही टीवी के कुछ धारावाहिक भी समाज को कुसंस्कारित करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण का जिम्मा असल में लोगों को ही लेना होगा। सभी कुछ सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। रामराज की कल्पना तभी साकार होगी जब लोग भगवान राम के आदर्शों पर चलेंगे और चरित्र निर्माण का जिम्मा स्वयं उठायेंगे।


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